धार्मिक और पुराणिक कथाओं में जल का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। यह न केवल जीवन के लिए आवश्यक तत्व है, बल्कि सृष्टि की उत्पत्ति और अंत में भी इसका महत्त्व अद्वितीय है। हम सभी जानते हैं कि “जल ही जीवन है” और यह पृथ्वी पर जीवन का आधार है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि भगवान विष्णु, जो सृष्टि के पालनकर्ता हैं, उन्हें जल में निवास करने वाले के रूप में क्यों दर्शाया गया है?
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से जल के बिना जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती, और यही बात हमें हिन्दू धर्म के शास्त्रों में भी मिलती है। भगवान विष्णु को नारायण कहा जाता है, जिसका अर्थ है “जो जल में निवास करते हैं।” परंतु यह नाम और जल में उनकी स्थिति के पीछे क्या गहरा अर्थ है?
जल और जीवन का संबंध
यह समझने के लिए, सबसे पहले हमें जल और जीवन के बीच संबंध को समझना होगा। हमारी पृथ्वी का तीन-चौथाई हिस्सा जल से घिरा हुआ है, और मानव शरीर का लगभग 70% हिस्सा भी जल से बना है। यह तथ्य ही यह सिद्ध करता है कि जल के बिना जीवन असंभव है। हिन्दू धर्मग्रंथों में भी जल को सृष्टि की उत्पत्ति और उसके अंत से जोड़ा गया है।
पुराणों के अनुसार, जब सृष्टि की रचना होती है, तो वह जल से होती है और प्रलय के समय सब कुछ फिर से जल में विलीन हो जाता है। यह जल, जिसे “एकार्णव” कहा गया है, सम्पूर्ण ब्रह्मांड में फैल जाता है, और भगवान विष्णु उसी जल में निवास करते हैं। इसीलिए उन्हें नारायण कहा जाता है।
भगवान विष्णु का जल में निवास का रहस्य
भगवान विष्णु के जल में स्थित होने के पीछे की कथा शिव पुराण में वर्णित है। एक समय भगवान शिव और माता पार्वती ने यह निर्णय किया कि सृष्टि का सृजन, पालन और संहार का कार्य बहुत व्यापक और जटिल है। इसे सुचारू रूप से चलाने के लिए उन्होंने एक दिव्य पुरुष की रचना की।
भगवान शिव ने अपनी शक्ति का प्रयोग करके विष्णु को उत्पन्न किया, जिनका रूप अत्यंत सुंदर और तेजस्वी था। शिव ने विष्णु को आदेश दिया कि वे कठोर तपस्या करें और सृष्टि के नियमों को समझें। विष्णु ने भगवान शिव की आज्ञा का पालन करते हुए गहन तपस्या आरंभ की। इस तपस्या के प्रभाव से उनके शरीर से जल की धाराएं प्रवाहित होने लगीं। यही वह जल था जिसने सम्पूर्ण ब्रह्मांड को भर दिया।
इसके बाद भगवान विष्णु ने उसी जल में शयन किया और तब से उन्हें नारायण कहा जाने लगा। नारायण का अर्थ है “जो जल में शयन करते हैं”।
जल का सृष्टि और प्रलय में महत्त्व
सृष्टि की रचना के समय भगवान विष्णु ने जल का निर्माण किया और उसमें अपने अंश से बीज डाला। यह बीज एक स्वर्ण अंड के रूप में विकसित हुआ, जिसमें सम्पूर्ण सृष्टि की रचना छिपी थी। इस अंड से आकाश, पृथ्वी, ब्रह्मा, सात पर्वत, सात समुद्र आदि उत्पन्न हुए। भगवान विष्णु ने स्वयं उस अंड में प्रविष्ट होकर सृष्टि का प्रारंभ किया।
जब सृष्टि का अंत होता है, तो प्रलय का समय आता है, और फिर से सारा ब्रह्मांड जल में समाहित हो जाता है। भगवान विष्णु उस समय शेषनाग पर शयन करते हुए दिखाए जाते हैं, जो यह संकेत करता है कि जल के बिना कुछ भी शेष नहीं रह सकता। जल जीवन का आधार है और जीवन का अंत भी।
धार्मिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण
धार्मिक दृष्टि से देखें तो विष्णु का जल में स्थित होना यह दर्शाता है कि जल सृष्टि के मूलभूत तत्वों में से एक है। यह केवल भौतिक जीवन का आधार नहीं है, बल्कि आध्यात्मिक दृष्टिकोण से भी जल शांति, भावनाओं और संतुलन का प्रतीक है।
विज्ञान भी इस बात की पुष्टि करता है कि बिना जल के जीवन की कोई संभावना नहीं है। यही कारण है कि वैज्ञानिक अन्य ग्रहों पर जल की खोज में लगे हैं, क्योंकि जहाँ जल है, वहां जीवन संभव है।
भगवान विष्णु का जल में शयन करना केवल प्रतीकात्मक नहीं है, बल्कि यह जीवन की अनवरत प्रक्रिया का द्योतक है। सृष्टि की रचना, संरक्षण और अंत सभी में जल का महत्त्व सर्वोपरि है।
भावनाओं और जल का संबंध
धार्मिक कथाओं में यह भी कहा गया है कि जल और भावनाएं एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। भगवान विष्णु के जल में शयन करने का यह अर्थ है कि जैसे जल में उथल-पुथल होती है, वैसे ही भावनाओं में भी होती है। जल शांत भी होता है और उफान भी मारता है, उसी प्रकार मनुष्य की भावनाएं भी शांत और उग्र हो सकती हैं।
भगवान विष्णु का जल में निवास यह भी संकेत करता है कि जीवन में भावनाओं का संतुलन बनाना आवश्यक है। एक संतुलित और धैर्यपूर्ण मन ही जीवन के कुरुक्षेत्र में सफल हो सकता है। कुरुक्षेत्र केवल युद्ध भूमि नहीं है, बल्कि यह मनुष्य के भीतर का युद्ध भी है, जहाँ विचारों और भावनाओं के बीच संघर्ष होता है।
भगवान विष्णु का जल में स्थित होना सृष्टि के सबसे गहरे सिद्धांतों को दर्शाता है। जल न केवल जीवन का आधार है, बल्कि यह सृष्टि के निर्माण और उसके अंत में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। विष्णु को नारायण कहा जाता है क्योंकि उन्होंने जल को जीवन का स्रोत माना और उसमें शयन किया। यह तथ्य हमें यह समझने में मदद करता है कि जल के बिना जीवन की कोई कल्पना नहीं की जा सकती।
जल और भावनाओं का गहरा संबंध हमें यह सिखाता है कि जीवन में संतुलन बनाए रखना कितना आवश्यक है। जैसे भगवान विष्णु जल में शांति से शयन करते हैं, वैसे ही हमें भी जीवन के संघर्षों में धैर्य और शांति बनाए रखनी चाहिए।
भगवान विष्णु जल में क्यों स्थित हैं?
भगवान विष्णु को जल में स्थित होने वाले के रूप में दर्शाया गया है क्योंकि जल जीवन का आधार है और सृष्टि की उत्पत्ति एवं अंत में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। उन्हें नारायण कहा जाता है, जिसका अर्थ है “जो जल में निवास करते हैं।”
नारायण का क्या अर्थ है?
नारायण का अर्थ है “जो जल में निवास करते हैं।” यह नाम भगवान विष्णु की जल में स्थिति को दर्शाता है, जो उनके संरक्षण और सृष्टि के साथ गहरे संबंध को स्पष्ट करता है।
जल और जीवन का संबंध क्या है?
जल और जीवन का संबंध अत्यंत गहरा है। पृथ्वी का तीन-चौथाई हिस्सा जल से घिरा हुआ है, और मानव शरीर का लगभग 70% हिस्सा भी जल से बना है। बिना जल के जीवन की कल्पना करना संभव नहीं है।
भगवान विष्णु का जल में शयन करना का क्या महत्व है?
भगवान विष्णु का जल में शयन करना सृष्टि की प्रक्रिया को दर्शाता है। यह संकेत करता है कि जल के बिना सृष्टि का कोई अस्तित्व नहीं है और यह जीवन का आधार है।
प्रलय के समय भगवान विष्णु का क्या होता है?
प्रलय के समय भगवान विष्णु शेषनाग पर शयन करते हुए दिखाई देते हैं, जो दर्शाता है कि प्रलय के समय सभी सृष्टि जल में विलीन हो जाती है और जल जीवन का अंतिम आश्रय होता है।